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Sunday, January 1, 2012

"नव वर्ष मंगलमय हो"

नमस्कार.....

सर्वप्रथम सभी पाठकों को नव वर्ष २०१२ की हार्दिक शुभकामनायें...ईश्वर आप सबके जीवन में सुख, शांति, समृधि और खुशियाँ लाये.....

इसी मंगलकामना को संजोये मेरी यह कविता आप सबको समर्पित है....


नया वर्ष मंगल...
हो सबको यहाँ जो...
मिले सबको खुशियाँ...
वो चाहे जहाँ हो...

ये मेरी दुआ सब...
सदा मुस्कुराएँ...
हो दिल में ख़ुशी...
और सभी जगमगायें...

प्रफुल्लित से मन हों...
उलस्सित से तन हों...
सभी लोग चेतन....
आनंदित जीवन हो ...

जो भी मन में बसता हो॥
वो मिल ही जाये...
कोई दूसरा उसका...
दिल न लुभाए...

जो तेरे ह्रदय को...
धड़कता सा कर दे...
तो तेरे लिए उसका...
दिल संग धडके...

जो आखों में कोई...
है तारे सा चमके...
वो इस वर्ष में...
तेरा रह जाये बनके...

सभी स्वप्न सबके...
ही हो जाएँ पूरे...
किन्ही कारणों से...
रहे जो अधूरे...

ये जीवन कविता...
सरीखा बनायें....
हर एक रंग इसमे...
सब चुनकर लगाएं...

हर इक कार्य सबके ...
हों पूरे सदा ही.....
हर इक आस सबकी...
हो पूरी सदा ही....

कविता से हम...
दिल को दिल से मिलाएं...
नए गीत हम नित....
सदा गुनगुनायें.....

ये "दीपक" कि विनती है...
इश्वर से अब तो....
हर इक पग पे उन्नति...
मिले आप सब को....

सभी के सभी मैं...
दुःख-सुख बाँट पाऊं ...
है जो वादा जो खुद से॥
उसे मैं निभाऊं...

मुझे मित्र माना....
आभारी मैं सबका...
ये मेरी तमन्ना...
बनूँ आप सब सा.....

आप सभी को स-परिवार नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें....

स-आदर....

दीपक शुक्ल....

Tuesday, November 29, 2011

नमस्कार मित्रो...

आज एक लम्बे अंतराल के बाद मैं पुनः लौटा हूँ...इस बीच तन से दूर रहा पर मेरा मन यहीं था...आप सबके बीच..इस बीच आप सबके कई भावपूर्ण लेख, कवितायेँ, ग़ज़लें, नज्में मैं नहीं पढ़ और न ही मैं चाह कर भी किसी नयी पोस्ट अथवा यथासंभव कवितामय टिप्पणियों या विशुद्ध भाषा मैं कहें तो अपनी तुकबंदियों के जरिये इतने दिन आप सबसे  संवाद न  कर सका, जिसका मुझे ह्रदय  से दुःख है....

तो लीजिये आज मैं पुनः  अपने ब्लॉग को नवजीवन देने का प्रयत्न कर रहा हूँ. अपनी इक नयी  कविता के साथ जो मैंने अपने आप पर लिखी है और इस कविता मैं मैंने खुद को कवि समझने की धृष्टता की है, जिसके लिए आप सब से क्षमा चाहता हूँ......यूँ तो सब मुझे जानते ही हैं पर .इस कविता मैं मैंने खुद को समेटने का प्रयत्न किया है..मैं जैसा हूँ, जो हूँ, वो आप सबकी नज़र है...अब आप ही बताएं की मैं अपने प्रयत्न में कितना सफल रहा...


हूँ "दीपक", मगर, मैं तो जलता नहीं हूँ..
कवि हूँ, कवि सा, मैं लगता नहीं हूँ... 

न छंदों, न गजलों, न गीतों में, रहता..
जो दिल में, है आता, वही मैं हूँ, लिखता..
मैं आठों पहर हूँ, "कविता" के संग ही ...
"कविता" ही,  मेरे है, जीवन में बसती..
कभी जाम,  मैंने, पिया न है,  फिर भी..
नशा ऐसा,  मुझको, संभालता नहीं हूँ...

हूँ "दीपक", मगर, मैं तो जलता नहीं हूँ..
कवि हूँ, कवि सा, मैं लगता नहीं हूँ...

न कातिल, अदाओं, में रहता हूँ,  मैं तो..
न कडवे को, मीठा, सा कहता हूँ,  मैं तो..
न सूखे में,  बारिश की, बूँदें गिराता..
न सड़कों पे,  कागज़ की, नावें चलाता..
है जो कुछ, है जैसा, वही मैं हूँ कहता..
मैं कुछ भी, तो खुद से, बदलता नहीं हूँ...

हूँ "दीपक", मगर, मैं तो जलता नहीं हूँ..
कवि हूँ, कवि सा, मैं लगता नहीं हूँ...

न बातों,  में मेरे, कोई ऐसा,  रस है..
न जीवन,  ही मेरा, सहज' और,  सरस है..
नियति से,  ज्यादा, समय से हो,  पहले..
जो मिलता,  है उस पर, कहाँ मेरा,  बस है..
में जैसा हूँ, जो हूँ, उसी में ही,  खुश हूँ..
कहीं देख कुछ भी, मचलता नहीं हूँ...

हूँ "दीपक", मगर, मैं तो जलता नहीं हूँ..
कवि हूँ, कवि सा, मैं लगता नहीं हूँ...

जो करता हूँ , दिल से, मैं वो बात करता..
मैं कविता, के जरिये, ही संवाद करता..
न दिल में, मेरे है, शिकायत या शिकवा..
न ही मैं, कभी भी, हूँ फ़रियाद करता..
मैं जीवन,  की नैया को, खेता रहा हूँ...
किनारा मिला,  पर, निकलता नहीं हूँ...

हूँ "दीपक", मगर, मैं तो जलता नहीं हूँ..
कवि हूँ, कवि सा, मैं लगता नहीं हूँ...

कोई मान मुझको,  मिला न है,  ऐसा..
कविता के बदले, नहीं चाहा,  पैसा...
न पुस्तक, कोई मेरी, जारी हुई है..
न चर्चा, ही कोई, हमारी हुई है...
जो है,  प्यार पाया, वो है,  आप सबका..
मैं ठहरा हुआ हूँ, मैं चलता नहीं हूँ...

हूँ "दीपक", मगर, मैं तो जलता नहीं हूँ..
कवि हूँ, कवि सा, मैं लगता नहीं हूँ...

आपके सुझावों/टिप्पणियों/मार्गदर्शन की प्रतीक्षा में....

सादर..

दीपक शुक्ल

Tuesday, February 15, 2011

"प्रेम दिवस"



नमस्कार मित्रो....

यूँ तो कल ही एक ग़ज़ल आप सबकी नज़र की है...पर प्रेम दिवस पर सोचा की मैं भी कुछ लिखूं और देखिये एक ग़ज़ल बन गयी है....आप भी पढ़िए और बताइए की कैसी लगी....


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मयकश कई हैं प्रेम के, मय की तलाश में...
साकी है पशोपेश में, किसको शराब दे....

लेकर गुलाब फिर रहे, हैं कितने मनचले....
ऐसे में कोई हम से फिर, कैसे गुलाब ले...


कहने को दिवस प्रेम का, आता है हर बरस...
अरसे से एक फूल है, सुखा किताब में...

शिद्दत कहाँ है, अब कहाँ, है प्यार में वो बात...
पैसा अहम् है, प्यार से, सबके हिसाब में...

मेरे खतों को फाड़ कर, भेजा था एक रोज़...
हमको नहीं गिला है, मिला, क्या जवाब में....

खुद को मिटा के हम तेरे, कुछ काम आ गए...
हस्ती मेरी कुछ काम तो, आई सब़ाब में....

मेरी तो हरेक बात में, रहते हो इस कदर...
देखा कहीं भी तुम रहे, अर्जे आदाब में....

"दीपक" तो उनके प्यार में, बरसों से जल रहा...
दीदार को तरसे हैं हम, और वो हिजाब में...

उनसे नज़र मिलाने की, चाहत रही, मगर...
वो तो नज़र झुकाए ही, आते हैं ख्वाब में....

आपकी टिप्पणियों/सुझावों/मार्गदर्शन का आकांक्षी...

दीपक शुक्ल...

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