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Monday, May 24, 2010

"वो भोली सी लड़की"

वो भोली सी लड़की,
वो प्यारी सी लड़की।
बड़ी खूबसूरत,
वो न्यारी सी लड़की॥

हम देखें उसे तो,
वो शर्माती रहती।
कहें कुछ जो उस से,
तो घबराती रहती॥

वो दामन संभाले,
नज़र को झुका के।
वो देखे नहीं हमको,
नज़रें उठा के॥

कोई जब भी बोले,
तभी बात करती।
मगर वो ...नहीं ,
सबके ही साथ करती॥

वो मीठी सी बोली
में बोली हमेशा।
मगर वो बहुत कम,
ही बोली हमेशा॥

कभी जो कहीं वो,
जरा मुस्कुराई।
लगा जैसे बदली,
गगन पे है छाई॥

हंसी जो कहीं वो,
किसी बात पर जो।
लगा जैसे सावन,
की बरसात आई॥

वो पलकें उठाये,
उठाकर गिराए।
बड़ी सादगी से,
वो दिल को चुराए॥

वो कजरारी आँखों में,
काजल अनोखा।
जिसे देख, हो साँझ का,
सबको धोखा॥

वो पहने गले में जो,
जो मोती की माला।
हर इक ख्वाब जैसे,
पिरोकर संभाला॥


जहाँ भी वो जाए,
फिजा गुनगुनाये।
महक से उसकी की,
समां महक सा जाये॥

वो सपनों में आके,
है हमको सताती।
वो दिन को सता के,
ही सपनों में आती॥

वो पहने है पाजेब,
छम-छम है करती,
मगर वो दबे पांव,
फिर भी है चलती॥

न जानूं की वो कबसे,
दिल में बसी है।
मैं जानूं वोही मेरे,
दिल में बसी है॥

वो भोली सी लड़की,

वो प्यारी सी लड़की।

बड़ी खूबसूरत,

वो न्यारी सी लड़की॥


आपकी टिप्पणियों/सुझावों/मार्गदर्शन का आकांक्षी..

दीपक शुक्ल...

Thursday, May 13, 2010

"सोचा करता हूँ"


मैं खिड़की पर बैठा अक्सर,
बाहर को देखा करता हूँ।
अपने जीवन की सच्चाई,
पढने की सोचा करता हूँ॥


क्षण-भंगुर है जीवन मेरा,
एस पल है, उस पल है नहीं,
अंतर्मन की में गहराई,
छूने की सोचा करता हूँ॥


कुदरत ने क्या क्या है बनाया,
नभ, धरती और चाँद सितारे,
दूर गगन में सूरज जैसा,
दिखने की सोचा करता हूँ॥


उडती चिड़िया को मैं देखूं,
मैं भी संग उड़ना चाहूँ,
उनके संग मैं दूर क्षितिज तक,
उड़ने की सोचा करता हूँ॥


जीवन जटिल, विषम है मेरा,
हर दिन युद्ध का नया सवेरा,
अंतिम साँसों तक मैं फिर भी,
लड़ने की सोचा करता हूँ॥


कविता अंतर्मन से निकले,
तो मन को हल्का करती,
अपनी हर इक आह पे कविता,
लिखने की सोचा करता हूँ॥


मन भावों का मंदिर है तो,
अभिव्यक्ति उसकी पूजा है,
अपने हर मनो-भाव पे मैं तो,
लिखने की सोचा करता हूँ॥

मैं खिड़की पर बैठा अक्सर,
बाहर को देखा करता हूँ।
अपने जीवन की सच्चाई,
पढने की सोचा करता हूँ॥

आपकी टिप्पणियों/सुझावों/मार्गदर्शन का आकांक्षी...
स-आदर॥


दीपक शुक्ल...





Monday, May 3, 2010

तुमको है देखा

आज में अपनी एक पुरानी कविता पुनः आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ...
आशा है की यह कविता आपको पसंद आएगी...

मैंने तो अब तक....
जहाँ भी है देखा....
तुमको ही पाया...
कहीं भी जो देखा...

फूलों में, बागों में....
शूलों में, काँटों में....
चुप्पी में, बातों में....
तुमको है देखा...

सतरंगी, रंगों में....
मन कि, उमंगों में...
तन कि, तरंगों में...
तुमको है देखा...

कविता के, बोलों में...
सावन के, झूलों में...
तीर्थों के, मेलों में...
तुमको है देखा...

मंदिर में, मूरत में...
खुद अपनी, सूरत में...
अपनी, ज़रूरत में...
तुमको है देखा...

ग़ज़लों के, शेरों में...
अग्नि के, फेरों में...
संझा, सवेरों में...
तुमको है देखा...

नीले गगन, में भी...
महके चमन, में भी...
बहती पवन, में भी...
तुमको है देखा...

सर्दी कि, रातों में...
अनकही, बातों में...
अपने ही, हाथों में...
तुमको है देखा...

बल खाती, नदियों में...
खिलती सी, कलियों में...
युग में भी, सदियों में....
तुमको है देखा...

रचना के, भावों में...
अपनी, निगाहों में...
ठंडी सी, आहों में...
तुमको है देखा...

तुम हो, मेरे मन में...
तुम ही, मेरे तन में...
जीवन के, उपवन में....
तुमको है देखा...

मैंने तो अब तक....
जहाँ भी है देखा....
तुमको ही पाया...
कहीं भी जो देखा...

आपकी टिप्पणियों/सुझावों की प्रतीक्षा में...

सादर ....

दीपक शुक्ल....

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