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Tuesday, February 15, 2011

"प्रेम दिवस"



नमस्कार मित्रो....

यूँ तो कल ही एक ग़ज़ल आप सबकी नज़र की है...पर प्रेम दिवस पर सोचा की मैं भी कुछ लिखूं और देखिये एक ग़ज़ल बन गयी है....आप भी पढ़िए और बताइए की कैसी लगी....


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मयकश कई हैं प्रेम के, मय की तलाश में...
साकी है पशोपेश में, किसको शराब दे....

लेकर गुलाब फिर रहे, हैं कितने मनचले....
ऐसे में कोई हम से फिर, कैसे गुलाब ले...


कहने को दिवस प्रेम का, आता है हर बरस...
अरसे से एक फूल है, सुखा किताब में...

शिद्दत कहाँ है, अब कहाँ, है प्यार में वो बात...
पैसा अहम् है, प्यार से, सबके हिसाब में...

मेरे खतों को फाड़ कर, भेजा था एक रोज़...
हमको नहीं गिला है, मिला, क्या जवाब में....

खुद को मिटा के हम तेरे, कुछ काम आ गए...
हस्ती मेरी कुछ काम तो, आई सब़ाब में....

मेरी तो हरेक बात में, रहते हो इस कदर...
देखा कहीं भी तुम रहे, अर्जे आदाब में....

"दीपक" तो उनके प्यार में, बरसों से जल रहा...
दीदार को तरसे हैं हम, और वो हिजाब में...

उनसे नज़र मिलाने की, चाहत रही, मगर...
वो तो नज़र झुकाए ही, आते हैं ख्वाब में....

आपकी टिप्पणियों/सुझावों/मार्गदर्शन का आकांक्षी...

दीपक शुक्ल...

Friday, February 11, 2011

" मेरा दर्द..."


नमस्कार मित्रो...

आज मैं काफी दिनों के उपरांत पुनः प्रस्तुत हुआ हूँ । इस बीच मैं करीब चार महीने तक इलाहबाद की पावन भूमि पर रह रहा था और अब पुनः अपनी पुरानी जगह पर वापस आ गया हूँ। कई मित्रों ने मुझे मेल और व्यक्तिगत तौर पर आग्रह किया कि मैं अपने ब्लॉग को पुनः संचारित करूँ जिसे समयाभाव एवं अन्य कारणों से पिछले कुछ दिनों से संचालित नहीं कर पा रहा था.

तो
लीजिये प्रस्तुत है मेरी एक रचना....जिसे मैंने कुछ समय पूर्व लिखा था और आज आप सबके साथ बाँट रहा हूँ....आशा है मेरा यह प्रयास आप सभी को अच्छा लगेगा....
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मैं मन में हूँ रोया अक्सर, ऊपर दिखता हँसता हूँ.
दुनिया का मैं दर्द देखकर, भीतर जलता रहता हूँ...

लाशों के ढेरों पर बैठी, मानवता को देखा है...
ऐसी मानवता से मैं तो, बचकर सदा निकलता हूँ...

भूखा रहकर मैंने कितनी बार, भूख को जाना है...
भूखे और बेचारों की मैं, मदद सदा ही करता हूँ...

कितनी माओं ने छोड़ा है, बच्चों को तो सड़कों पर...
उनके जिगर के टुकड़ों को मैं, अपना सदा समझता हूँ...

धरती के बेटों को जब भी, मरता मैं देखा है...
उनका दर्द समझकर कितनी, बार ही मैं भी मरता हूँ...

कितने ही लोगों को मैंने, रोज़ सिसकते देखा है...
टूट के उनकी आहों से मैं, खुद भी सदा बिखरता हूँ...

कितनी बार जलाई बहूएँ, निर्दयी निष्ठुर लोगों ने...
उनकी निर्दयता पे अक्सर, मैं तो सदा सुलगता हूँ....

मैं मन में हूँ रोया अक्सर, ऊपर दिखता हँसता हूँ.
दुनिया का मैं दर्द देखकर, भीतर जलता रहता हूँ...


आपकी टिप्पणियों/मार्गदर्शन/ सुझावों की प्रतीक्षा में.....


दीपक शुक्ल.....

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