Friday, November 30, 2007

दीपक.....

दीपक भी माटी का ...
मैं भी हूँ माटी का ...
मेरी तो माटी बस....
तेरे से साथी हैं

जिन संग मैं हँसता हूँ....
बातें मैं करता हूँ......
कविता के बोलों में...
खोया मैं रहता हूँ...

जीते तो सब ही हैं...
सार्थक उसका जीवन ...
दूजे कि खातिर जो....
करता खुद को अर्पण...

जीवन ये मेरा भी...
सबको समर्पित है...
सबके मैं काम आऊं...
मन मेरा अर्पित है...

दर्द उसको कहते हैं ..
खुद के लिए है जो...
मन कि "ख़ुशी" है वो...
सबके लिए है जो...

ईश्वर से विनती ये...
मेरी है दिल से...
जीवन सफल कर ....
मिलता मुश्किल से...

सबको रोशन कर दूं...
मेरी ये इच्छा है...
सबके संग मैं खुश हूँ...
मेरी ये इच्छा है...

सबकी ही आखों मैं...
तारे सा चमकूं...
बिरहन के दिल को मैं...
खुशिओं से भर दूं...

पथिकों कि राहें मैं...
उजला सा कर दूं...
दीनों कि कुटिया को ...
रोशन मैं कर दूं....

"दीपक" जब कहते सब ..
दीपक मैं बन पाऊँ...
याद सब मुझको रखें...
ऐसा कुछ कर जाऊँ...

सा-आदर ....

दीपक

...

Thursday, November 29, 2007

बचपन.....

बचपन के किस्सों में ..
राजा थे रानी थी...
अपनी भी बूढी सी..
दादी थीं नानी थीं...

चन्दा को हम मामा..
कहकर बुलाते थे..
छत पर हम तारों संग...
बातें बनाते थे...

आँगन में अपने भी...
जमघट सा लगता था..
दादी और बाबा संग...
मेला सा जुटता था...

तितली के पीछे भी...
हम भगा करते थे...
पत्थर से आमों को...
तोडा हम करते थे...

डोरों पतंगों में...
उलझे से रहते थे...
टूटे खिलोने में...
खोये से रहते थे...

खेतों किनारे हम...
साईकिल चलाते थे...
चिडियों को छत पर हम...
दाना खिलाते थे...

प्यारी सी एक लड़की...
संग खेला करती थी...
छोटी सी बातों पर....
वो रोया करती थी....

सीधी थी फिर भी हम...
उसको सताते थे...
जितना वो चिढ़ती थी..
उतना चिढ़आते थे...

इमली और जामुन हम..
संग बीना करते थे...
एक इमली की खातिर...
आपस मैं लड़ते थे...

गावों के मेलों में...
हम जब भी जाते थे...
टिक्की, बतासे, जलेबी...
हम खाते थे....

झूला हिन्डोंले में...
हम झूला करते थे...
अक्सर खिलोनों पर....
हम मचला करते थे...

हम सबसे मिलते थे...
हँसते हंसाते थे...
अक्सर हम शामों में...
हुडदंग मचाते थे...

कागज के रॉकेट को...
हम तो उडाते थे...
बारिश के पानी मैं...
नावें चलते थे...

छोटी सी दुनिया थी...
छोटे से सपने थे...
हम तो बस तब सिमटे...
घर में ही अपने थे...

अब न वो बचपन है ...
न वो कहानी...
अब न वो किस्से ....
न बातें पुरानी....

अपनी तो इच्छा ये...
लौटें दिन जीवन के....
जाकर जो आये न...
दिन फिर वो "बचपन" के ...

इक इक कर सब छूटे ....
हमसे तो अब तक...
यादों में बसते सब ....
भूले न अब तक ...

स-आदर......दीपक....

Wednesday, November 28, 2007

"एड्स"

कल तक वो फूल जैसा..
महका सबके साथ में...
जिन्दगी कम होती उसकी..
रेत जैसे हाथ में....

उसकी आखों में थे देखे...
हमने तो सपने कई..
टूट कर बिखरे हैं सब ही....
बदले से हालत में...

बातें जो करता था रहता...
चाँद तारों की सदा...
छत पे जाने को है तरसा...
शख्स वो हर रात में...

कितने अरसे से वो मेरे...
संग ही में था रहा....
खट्टे-मीठे कितने किस्से...
यादों की बारात में...

आँखों में तो बस नमी है...
आशा न कोई बची है...
"एड्स" का रोगी बना वो...
सब इसी आघात में...

सांत्वना कैसी भी दें तो...
वो अधूरी सी लगे....
सोच न पाएं कहें क्या...
अपनी उस मुलाकात में....

माँ को देखूं मैं जो उसकी...
दिल मेरा टूटा ही जाये...
पत्नी की वो करून चीखें...
गूंजती जज्बात में....

तूफ़ान में पतवार टूटी...
मांझी की हिम्मत भी छूटी...
जिन्दगी की नाव डोले...
गम की इस बरसात में...

"एड्स" ने लाया है "दीपक"...
जिन्दगी को कटघरे में....
दोष उसका कोई दे तो....
दोष उसकी जात में....

कल तक वो फूल जैसा..
महका सबके साथ में...
जिन्दगी कम होती उसकी..
रेत जैसे हाथ में......................

.................. Deepak

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