Tuesday, August 17, 2010

यही जुर्म हमने, किया सबसे पहले...

नमस्कार मित्रो...

कई दिनों से मेरे कई मित्रों का आग्रह था की में अपने ब्लॉग पर भी कोई पोस्ट डालूं...जबकि मैं अधिकांशतः टिप्पणियों में ही कवितायेँ लिख रहा था....

तो लीजिये प्रस्तुत है मेरी ताज़ा तरीन ग़ज़ल का पहला भाग...जिसे मैंने बड़े दिल से लिखा है जोकि आशा है की आपके दिल तक अवश्य पहुंचेगी...

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यही जुर्म हमने, किया सबसे पहले...
तेरा नाम हमने, लिया सबसे पहले...

तेरे गेसुओं की, वो उलझी लटों का...
जो जादू था हमपे, चला सबसे पहले...

वो सर्दी के मौसम में, तेरा सिमटना...
यही रूप दिल में, बसा सबसे पहले...

वो आखों में तेरी, जो तिनका गिरा था...
तेरा गाल उस दिन, छुआ सबसे पहले...

सभी ने दुआ जब भी, मांगी है "दीपक"
मेरा हाथ हरदम, उठा सबसे पहले...

तुम्हें हँसते देखा, जो हमने किसी से...

तो सच में कहूँ की, जला सबसे पहले...

यही जुर्म हमने, किया सबसे पहले...
तेरा नाम हमने, लिया सबसे पहले...

आपकी टिप्पणियों/मार्गदर्शन/ सुझावों की प्रतीक्षा में.....

दीपक शुक्ल.....

Wednesday, July 21, 2010

"अच्छा लड़का"


नमस्कार मित्रो...

आज मैं आपको अपनी एक रचना सुनाता हूँ जोकि आशा है कि आपको पसंद आएगी।
इसमे मैंने एक अच्छा लड़का बनने के लिए क्या क्या जतन किये, किन किन acid टेस्ट्स से गुज़रा उनका ब्यौरा संजोया है पर जब से मेरी "कविता" से मुहब्बत हुई,मेरी दुनिया ही बदल गयी है, अब अच्छा लड़का बनने के लिए मुझे वो पापड़ नहीं बेलने पड़ते बल्कि लोग मुझे स्वतः ही अच्छा और सच्चा मानने लगे हैं....आखिर मुहब्बत में शक्ति होती है न। और हाँ ये कोई "मिस कविता" नहीं हैं बल्कि ये वो "कविता" है जो आपके और मेरे अंतर्मन में बसी हुई है...

तो लीजिये प्रस्तुत है...... "अच्छा लड़का"
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बचपन से ही मात पिता की...
ने हर इच्छा को माना...
कभी फेल न हुआ हूँ में तो...
सबने अच्छा लड़का माना...
सबने सच्चा लड़का माना...

कालेज में गुट-बाज़ी के न...
चक्कर में मैं कभी भी आया...
गुरु-आज्ञा सर्वोपरि समझी...
सब गुरुओं ने गले लगाया॥
उनके पीछे घूम घूम के...
मैंने गूढ़ विषय को जाना...
सबने अच्छा लड़का माना...

सबने सच्चा लड़का माना...

सहपाठिन चाहे कितना भी...
सजकर मेरे सम्मुख आयीं...
नज़र बचाकर निकला हूँ मैं...
नज़र पड़ी तो वे शर्मायीं...
कभी न उनसे बोल मैं पाया...
कभी न सीखा बात बनाना...
सबने अच्छा लड़का माना...

सबने सच्चा लड़का माना...

कॉलेज में हुडदंग किया न...
लाइब्रेरी में शोर किया...
कभी किसी सहपाठी को न...
गप्प सुना कर बोर किया...
कक्षा में भी चुप ही बैठा...
कभी न गया कोई गाना....
सबने अच्छा लड़का माना...
सबने सच्चा लड़का माना...

जॉब मिला तो बॉस मिला है...
फिर लोगों का साथ मिला है...
इनमे से कुछ पान चबाते...
सिगरेटे भी हैं कुछ सुलगाते...
उनके संग भी रहकर मैंने...
न चाह कुछ भी अपनाना...
सबने अच्छा लड़का माना...
सबने सच्चा लड़का माना...

मैडम ऑफिस की कितनी ही...
सेल पर बातें करती रहतीं...
अपनी आँखों को मटका कर...
सबसे ही वो हंसतीं रहतीं...
उनकी हर अदा पे मैंने...
सीखा है तो बस मुस्काना...
सबने अच्छा लड़का माना...
सबने सच्चा लड़का माना...

"कविता" से जब प्रेम किया है...
"कविता" ने भी प्रेम दिया है...
दिल की बात को कहना सीखा...
कभी कभी चुप रहना सीखा...
सबके सुख से मैं आनंदित...
दूजे का दुःख मैंने जाना...
सबने अच्छा लड़का माना...
सबने सच्चा लड़का माना...

दीपक शुक्ल...

आपके सुझावों/मार्गदर्शन/टिप्पणियों की प्रतीक्षा में...

दीपक शुक्ल...






Monday, May 24, 2010

"वो भोली सी लड़की"

वो भोली सी लड़की,
वो प्यारी सी लड़की।
बड़ी खूबसूरत,
वो न्यारी सी लड़की॥

हम देखें उसे तो,
वो शर्माती रहती।
कहें कुछ जो उस से,
तो घबराती रहती॥

वो दामन संभाले,
नज़र को झुका के।
वो देखे नहीं हमको,
नज़रें उठा के॥

कोई जब भी बोले,
तभी बात करती।
मगर वो ...नहीं ,
सबके ही साथ करती॥

वो मीठी सी बोली
में बोली हमेशा।
मगर वो बहुत कम,
ही बोली हमेशा॥

कभी जो कहीं वो,
जरा मुस्कुराई।
लगा जैसे बदली,
गगन पे है छाई॥

हंसी जो कहीं वो,
किसी बात पर जो।
लगा जैसे सावन,
की बरसात आई॥

वो पलकें उठाये,
उठाकर गिराए।
बड़ी सादगी से,
वो दिल को चुराए॥

वो कजरारी आँखों में,
काजल अनोखा।
जिसे देख, हो साँझ का,
सबको धोखा॥

वो पहने गले में जो,
जो मोती की माला।
हर इक ख्वाब जैसे,
पिरोकर संभाला॥


जहाँ भी वो जाए,
फिजा गुनगुनाये।
महक से उसकी की,
समां महक सा जाये॥

वो सपनों में आके,
है हमको सताती।
वो दिन को सता के,
ही सपनों में आती॥

वो पहने है पाजेब,
छम-छम है करती,
मगर वो दबे पांव,
फिर भी है चलती॥

न जानूं की वो कबसे,
दिल में बसी है।
मैं जानूं वोही मेरे,
दिल में बसी है॥

वो भोली सी लड़की,

वो प्यारी सी लड़की।

बड़ी खूबसूरत,

वो न्यारी सी लड़की॥


आपकी टिप्पणियों/सुझावों/मार्गदर्शन का आकांक्षी..

दीपक शुक्ल...

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