
मैं खिड़की पर बैठा अक्सर,
बाहर को देखा करता हूँ।
अपने जीवन की सच्चाई,
पढने की सोचा करता हूँ॥
क्षण-भंगुर है जीवन मेरा,
एस पल है, उस पल है नहीं,
अंतर्मन की में गहराई,
छूने की सोचा करता हूँ॥
कुदरत ने क्या क्या है बनाया,
नभ, धरती और चाँद सितारे,
दूर गगन में सूरज जैसा,
दिखने की सोचा करता हूँ॥
उडती चिड़िया को मैं देखूं,
मैं भी संग उड़ना चाहूँ,
उनके संग मैं दूर क्षितिज तक,
उड़ने की सोचा करता हूँ॥
जीवन जटिल, विषम है मेरा,
हर दिन युद्ध का नया सवेरा,
अंतिम साँसों तक मैं फिर भी,
लड़ने की सोचा करता हूँ॥
कविता अंतर्मन से निकले,
तो मन को हल्का करती,
अपनी हर इक आह पे कविता,
लिखने की सोचा करता हूँ॥
मन भावों का मंदिर है तो,
अभिव्यक्ति उसकी पूजा है,
अपने हर मनो-भाव पे मैं तो,
लिखने की सोचा करता हूँ॥
मैं खिड़की पर बैठा अक्सर,
बाहर को देखा करता हूँ।
अपने जीवन की सच्चाई,
पढने की सोचा करता हूँ॥
आपकी टिप्पणियों/सुझावों/मार्गदर्शन का आकांक्षी...
स-आदर॥
दीपक शुक्ल...